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मेरे दिल की बात

मेरा पूर्ण विश्वास है की हम जो भी परमपिता परमेश्वर से मन से मागते है हमें मिलता है जो नहीं मिलता यां तो हमारे मागने में कमी है यां फिर वह हमारे लिए आवश्यक नहींहै क्योकि वह (प्रभु ) हमारी जरूरतों को हम से बेहतर जनता है फिर सौ की एक बात जो देने की क्षमता रखता है वह जानने की क्षमता भी रखता है मलकीत सिंह जीत>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> ................ मेरे बारे में कुछ ख़ास नहीं संपादक :- एक प्रयास ,मासिक पत्रिका पेशे से :-एक फोटो ग्राफर , माताश्री:- मंजीत कौर एक कुशल गृहणी , पिताश्री :-सुरेन्द्र सिंह एक जिम्मेदार पिता व् जनप्रतिनिधि (ग्राम प्रधान1984 -1994 /2004 - अभी कार्यकाल जारी है http://jeetrohann.jagranjunction.com/
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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

मैं और मेरे पिता (एक प्रेरक लोक कथा )


जब मै 3 वर्ष का था तब मै सोचता था कि मेरे पिता दुनिया  सबसे मजबूत और  ताकतवर व्यक्ति हैं |
जब मैं 6  वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता दुनिया के सबसे ताकतवर ही नहीं सबसे समझदार व्यक्ति भी हैं |
जब मैं 9 वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता को दुनिया की हर चीज का ज्ञान है |
जब मैं 12 वर्ष का हुआ तब मैं महसूस करने लगा कि मेरे मित्रो के पिता मेरे पिता के मुकाबले ज्यादा समझदार है |
जब मै 15 वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता को दुनिया में  चलने के लिए कुछ और ज्ञान कि जरुरत है |
जब मैं 20 वर्ष का हुआ तब मुझे   महसूस हुआ कि मेरे पिता किसी और ही दुनिया के है और वे हमारी सोच के साथ नहीं चल सकते |
जब मैं 25 वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया मुझे किसी भी काम के बारे में अपने पिता से सलाह नहीं करनी चाहिए ,क्योकि उनमे हर काम में कमी निकलने कि आदत सी पड़ गई है |
जब मैं 30 वर्ष का हुआ तब में महसूस करने लगा कि मेरे पिता को मेरी नक़ल करके कुछ समझ आ गई है |
जब मैं 35 वर्ष का हुआ तब मै  महसूस करने लगा कि उनसे छोटी मोटी बातो के बारे  में सलाह ली जा सकती है |
जब मैं 40 वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि कुच्छ जरुरी मामलो में भी पिता जी से सलाह ली जा सकती है |
जब मैं 50 वर्ष का हुआ तब मैंने फैसला किया कि मुझे अपने पिता कि सलाह के बिना कुछ भी नहीं करना चाहिए ,क्योकि मुझे यह ज्ञान हो चुकाथा कि मेरे पिता दुनिया  के सबसे समझदार व्यक्ति है पर इससे पहले कि मैं अपने इस फैसले पर अमल कर पातामेरे पिता जी इस संसार को अलविदा कह गए और मैं अपने पिता कि हर सलाह और तजुर्बे से वंचित रहगया |
    
 ( एक प्रेरक  लोक कथा)